
श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान उस समय अवतरित हुआ जब कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन मोह और निराशा से घिर गए थे। इसी दौरान भगवान श्रीकृष्ण ने पार्थ को समझाया कि यह युद्ध कितना जरूरी है। ऐसे में श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय के सातवें श्लोक ‘यदा यदा हि धर्मस्य’ का मतलब इस आर्टिकल में समझते हैं।
श्लोक
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
इसका अर्थ है – “हे अर्जुन, जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब मैं प्रकट होता हूं, यानी अवतार लेता हूं।”
क्यों कहा श्रीकृष्ण ने ऐसा?
श्रीकृष्ण का यह दिव्य वचन है। यहां ‘धर्म’ का मतलब केवल पूजा-पाठ या कर्मकांड से नहीं, बल्कि सत्य, न्याय और मानवता के कर्तव्यों से है। जब समाज में अन्याय इतना बढ़ जाता है कि लोगों का जीना मुश्किल हो जाता है और मर्यादाएं टूटने लगती हैं, तब ब्रह्मांडीय संतुलन बनाए रखने के लिए भगवान की शक्ति प्रत्यक्ष रूप में प्रकट होती हैं।
केवल अधर्म का नाश नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना
अक्सर लोग समझते हैं कि भगवान केवल दुष्टों को मारने आते हैं, लेकिन इस श्लोक का गहरा मतलब ‘सृजन’ (रचना/उत्पत्ति) में छिपा है। श्रीकृष्ण कहते हैं ‘तदात्मानं सृजाम्यहम्’ यानी मैं अवतार लेता हूं ताकि सत्य की राह पर चलने वालों की रक्षा हो सके और समाज में फिर से सत्य स्थापित किया जा सके।
जीवन की मुश्किलों का समाधान
यह श्लोक हमें सिखाता है कि अंधकार चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, प्रकाश का आना तय है।
धैर्य – जब आपको लगे कि आपके जीवन में अन्याय हो रहा है, तो यह श्लोक याद दिलाता है कि ईश्वर न्याय करेंगे।
कर्म – यह हमें अधर्म के विरुद्ध खड़े होने और अपने हिस्से का धर्म निभाने की प्रेरणा देता है।
सकारात्मकता – यह विश्वास दिलाता है कि बुराई की उम्र लंबी हो सकती है, लेकिन जीत सत्य की ही होती है।



